Urban Company ने कैसे बनाया अरबो का कंपनी? जानिए आसान भाषा में।

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और सर्विस सेक्टर
हाल ही में भारत ने जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का मुकाम हासिल कर लिया है। मौजूदा अनुमानों के अनुसार, 2028 तक भारत जर्मनी को भी पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। साल 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर की है, जिसमें से करीब 54 प्रतिशत हिस्सा सर्विस सेक्टर का है। बाकी हिस्सा कृषि और मैन्युफैक्चरिंग से आता है।
भारत को चलाने वाले 14.5 करोड़ लोग
भारत की असली ताकत यही सर्विस इकॉनमी है। नीति आयोग के मुताबिक करीब 18.4 करोड़ लोग इस सेक्टर में काम करते हैं। इनमें से लगभग 80 प्रतिशत लोग अनौपचारिक यानी इनफॉर्मल सेक्टर में हैं और सिर्फ 20 प्रतिशत लोग आईटी, बैंकिंग जैसे फॉर्मल सेक्टर में। इसका मतलब है कि करीब 14.5 करोड़ लोग ऐसे हैं जो रोजमर्रा की सेवाओं से देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं। ये लोग इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, घरेलू कामगार, ब्यूटी पार्लर वर्कर, ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, कंस्ट्रक्शन वर्कर, कूड़ा संभालने वाले, स्ट्रीट वेंडर और ऐसे ही कई कामों से जुड़े हुए हैं। यही लोग हमारे शहरों को चलाते हैं। अगर ये लोग न हों तो शहरी भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इन लोगों की सबसे बड़ी परेशानी
लेकिन लंबे समय तक इन लोगों की जिंदगी बहुत मुश्किल रही है। यह पूरा सेक्टर बिखरा हुआ था। न कोई तय रेट, न कोई भरोसा और न ही कोई ट्रेनिंग सिस्टम। बीच में हमेशा दलाल और ठेकेदार होते थे जो ग्राहक से मोटी रकम लेते थे और काम करने वाले को बहुत कम पैसा देते थे। मान लीजिए कोई आदमी किसी इलेक्ट्रिक शॉप में मैकेनिक बनकर 12 हजार रुपए से काम शुरू करता है, तो सालों बाद भी उसकी सैलरी मुश्किल से 20 या 25 हजार तक ही पहुंच पाती थी। वजह यही थी कि ग्राहक और काम करने वाले के बीच एक मिडलमैन खड़ा होता था जो ज्यादातर पैसा खुद रख लेता था। इससे न ग्राहक खुश होता था और न ही काम करने वाला।
टेक्नोलॉजी ने कैसे बदला खेल
धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी ने इस सिस्टम को बदलना शुरू किया। ओला और रैपिडो ने टैक्सी सेक्टर को व्यवस्थित किया, ज़ोमैटो और स्विगी ने खाना डिलीवरी को और शिपरॉकेट ने लॉजिस्टिक्स को। लेकिन घर की सर्विस जैसे प्लंबर, ब्यूटी, सफाई, एसी रिपेयर जैसी चीजें अब भी बिखरी हुई थीं। यहीं से Urban Company की कहानी शुरू होती है।
तीन युवाओं का बड़ा सपना
तीन दोस्त, अभिराज, वरुण और राघव, विदेश में काम कर रहे थे लेकिन 2013 में भारत लौट आए। उनका सपना था भारत की किसी बड़ी समस्या को हल करना। वे सड़कों पर लोगों से बात करते थे और पूछते थे कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में सबसे बड़ी परेशानी क्या है। तब उन्हें समझ आया कि घर की सर्विस सबसे बड़ी समस्या है। लोग पैसा देने को तैयार हैं लेकिन भरोसेमंद और प्रोफेशनल सर्विस मिलना मुश्किल है।
फेसबुक से शुरू हुई अरबों की कंपनी
2014 में अभिराज ने एक फेसबुक ग्रुप बनाया और लिखा कि किसी को भी कोई सर्विस चाहिए तो संपर्क करे। लोग मैसेज करने लगे, किसी को कारपेंटर चाहिए था, किसी को प्रिंटर, किसी को प्लंबर। अभिराज खुद सर्विस प्रोवाइडर ढूंढकर उन्हें जोड़ता था। इसी छोटे से आइडिया से UrbanClap की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर Urban Company बना।
असली बदलाव तब आया जब मॉडल बदला
कुछ महीनों में उन्होंने वेबसाइट लॉन्च की और निवेशकों से पैसा भी मिलने लगा। कंपनी तेजी से बढ़ी और कई शहरों में फैल गई। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि सिर्फ लोगों को जोड़ देना काफी नहीं है। असली समस्या क्वालिटी, ट्रेनिंग और भरोसे की थी। इसलिए उन्होंने अपना पूरा मॉडल बदल दिया और एक कैटेगरी को गहराई से समझने का फैसला किया, जो थी महिलाओं की ब्यूटी सर्विस।
Urban Company का विस्तार
उन्होंने इन वर्कर्स को ट्रेनिंग देना शुरू किया, उनके लिए अच्छे प्रोडक्ट्स की सप्लाई चेन बनाई और जरूरत पड़ने पर उन्हें फाइनेंस भी दिया। इससे सर्विस की क्वालिटी सुधरी, ग्राहक खुश हुए और काम करने वालों की कमाई भी बढ़ी। यही वह पल था जब Urban Company को अपना सही मॉडल मिल गया।
नए प्रोडक्ट और नया भविष्य
इसके बाद कंपनी बहुत तेजी से बढ़ी, लाखों ग्राहक जुड़े और कंपनी की वैल्यू अरबों डॉलर तक पहुंच गई। बाद में उन्होंने अपना नाम UrbanClap से बदलकर Urban Company कर लिया और विदेशों में भी कदम रखा। हालांकि कोविड के दौरान कई देशों में उन्हें अपना ऑपरेशन बंद करना पड़ा।
एक साधारण आइडिया से बड़ा बदलाव
अब Urban Company एक नए रास्ते पर चल रही है। उसने अपने खुद के प्रोडक्ट्स जैसे Native नाम का वाटर प्यूरिफायर लॉन्च किया है, जो दो साल तक बिना सर्विस के चलता है। कंपनी को पता है कि लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी सर्विस में होती है, इसलिए वे ऐसे प्रोडक्ट बना रहे हैं जिनमें बार-बार सर्विस की जरूरत न पड़े। भारत का होम अप्लायंस मार्केट बहुत बड़ा है और Urban Company इसे अपना अगला बड़ा मौका मान रही है।
आज Urban Company एक ऐसे मुकाम पर है जहां उसने भारत के अनौपचारिक सर्विस सेक्टर को एक नई पहचान दी है। लेकिन आगे की राह आसान नहीं है क्योंकि बाजार में पहले से बड़े ब्रांड मौजूद हैं और नए सेक्टर में उतरना हमेशा जोखिम भरा होता है। इसके बावजूद Urban Company की कहानी यह दिखाती है कि अगर सही समस्या को सही तरीके से सुलझाया जाए तो एक साधारण फेसबुक पोस्ट से भी अरबों की कंपनी खड़ी की जा सकती है।